दिन के 7 घंटे 43 मिनट स्क्रीन पर: जेन-ज़ी में बढ़ता डिजिटल बर्नआउट और उसका इलाज
स्क्रीन टाइम साल में 122 दिन के बराबर — नींद, ध्यान और सेहत पर असर, और "डिजिटल सनसेट" जैसे उपाय

सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले फ़ोन, और रात को सोने से पहले आख़िरी चीज़ भी फ़ोन — यह दिनचर्या अब अपवाद नहीं, नियम बन चुकी है। ताज़ा वैश्विक आँकड़े बताते हैं कि जेन-ज़ी यानी नई पीढ़ी का औसत स्क्रीन टाइम रोज़ाना लगभग सात घंटे तैंतालीस मिनट तक पहुँच गया है, जो पिछले साल की तुलना में क़रीब पाँच प्रतिशत ज़्यादा है। साल भर के हिसाब से देखें तो यह लगभग 122 दिन बनता है — यानी नींद पर ख़र्च होने वाले दिनों से भी थोड़ा ज़्यादा। भारत में इसका असर सबसे तेज़ी से शहरी युवाओं और किशोरों पर दिख रहा है। कई अध्ययनों में सामने आया है कि शहरी किशोर औसतन छह घंटे से भी कम सो पा रहे हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह देर रात तक स्क्रीन पर बने रहना है। डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक इसे "डिजिटल फ़टीग" या डिजिटल थकान कह रहे हैं — एक ऐसी थकान जो शरीर से ज़्यादा दिमाग़ को घेरती है। ## बर्नआउट अब करियर के शुरुआती दौर में पहले माना जाता था कि बर्नआउट यानी काम की थकान से पैदा होने वाली मानसिक जड़ता, करियर के मध्य में आती है। अब तस्वीर बदल गई है। रिपोर्टें बताती हैं कि जेन-ज़ी पेशेवर पिछली पीढ़ियों की तुलना में कहीं जल्दी बर्नआउट का सामना कर रहे हैं। इसके पीछे तीन बड़े कारण गिनाए जा रहे हैं: **हमेशा उपलब्ध रहने का दबाव:** काम के मैसेज दफ़्तर के घंटों तक सीमित नहीं रहे। रात नौ बजे आया एक मैसेज पूरी शाम की मानसिक शांति ख़त्म कर सकता है। **लगातार तुलना:** सोशल मीडिया पर हर कोई अपना सबसे अच्छा पल दिखाता है। लगातार दूसरों की उपलब्धियाँ देखते रहना अपनी सामान्य ज़िंदगी को अपर्याप्त महसूस कराता है। **डूमस्क्रोलिंग:** नकारात्मक ख़बरों और वीडियो के अंतहीन प्रवाह में बिना उद्देश्य के स्क्रॉल करते रहना दिमाग़ को लगातार सतर्क अवस्था में रखता है, जिससे आराम की स्थिति आती ही नहीं। दिलचस्प बात यह है कि यही पीढ़ी सबसे ज़्यादा सजग भी है। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 63 प्रतिशत जेन-ज़ी ने अपनी भलाई के लिए जान-बूझकर स्क्रीन से दूरी बनाने की कोशिश की है। यानी समस्या के साथ-साथ समाधान की चेतना भी इसी पीढ़ी में सबसे मज़बूत है। ## शरीर पर क्या असर पड़ता है **नींद की गुणवत्ता:** स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी मेलाटोनिन नामक हार्मोन के स्राव को रोकती है, जो नींद लाने के लिए ज़िम्मेदार है। इसका नतीजा यह होता है कि थकान महसूस होने के बावजूद नींद देर से आती है, और सुबह उठने पर ताज़गी नहीं मिलती। **आँखों पर दबाव:** लगातार पास की स्क्रीन देखने से पलक झपकने की दर घट जाती है, जिससे आँखों में सूखापन, जलन और सिरदर्द होता है। इसे "डिजिटल आई स्ट्रेन" कहा जाता है। **गर्दन और पीठ:** झुककर फ़ोन देखने की मुद्रा गर्दन की मांसपेशियों पर कई गुना अतिरिक्त भार डालती है। युवाओं में गर्दन और कंधे के दर्द की शिकायतें तेज़ी से बढ़ी हैं। **शारीरिक निष्क्रियता:** स्क्रीन पर बीता हर अतिरिक्त घंटा वह समय है जो चलने, खेलने या व्यायाम से घटा है। इसका सीधा असर वज़न, मेटाबॉलिज़्म और हृदय-स्वास्थ्य पर पड़ता है। **ध्यान की अवधि:** छोटे-छोटे वीडियो और तेज़ कट वाले कंटेंट के अभ्यस्त दिमाग़ को लंबी किताब पढ़ने या गहरे काम में डूबने में कठिनाई होने लगती है। ## "डिजिटल सनसेट" — सबसे असरदार आदत दुनियाभर में युवाओं के बीच जो एक आदत सबसे तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है, वह है डिजिटल सनसेट। इसका अर्थ है — सोने से क़रीब एक घंटा पहले सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद कर देना। यह सुनने में साधारण लगता है, लेकिन इसका असर सबसे तेज़ दिखता है। इसे व्यावहारिक बनाने के कुछ तरीक़े: - फ़ोन को बिस्तर से दूर, दूसरे कमरे या कम से कम कमरे के दूसरे कोने में रखें। अलार्म के लिए साधारण घड़ी का उपयोग करें। - रात के लिए फ़ोन में "डू नॉट डिस्टर्ब" शेड्यूल कर दें, ताकि निर्णय हर रात दोबारा न लेना पड़े। - सोने से पहले का एक तय काम बनाएँ — किताब के कुछ पन्ने, हल्की स्ट्रेचिंग, या अगले दिन की सूची लिखना। ## दिन के लिए व्यावहारिक नियम **पहला — सुबह का पहला घंटा स्क्रीन-मुक्त।** दिन की शुरुआत नोटिफ़िकेशन से करने पर दिमाग़ शुरू से ही प्रतिक्रिया-मोड में चला जाता है। पहले घंटे को पानी, थोड़ी धूप, हल्की गतिविधि और नाश्ते के लिए रखें। **दूसरा — नोटिफ़िकेशन की छँटाई।** हर ऐप को आपका ध्यान माँगने का अधिकार नहीं है। केवल कॉल, मैसेज और सचमुच ज़रूरी ऐप के नोटिफ़िकेशन चालू रखें, बाक़ी बंद कर दें। यह एक बार का काम है और असर रोज़ दिखता है। **तीसरा — 20-20-20 नियम।** हर बीस मिनट पर, बीस सेकंड के लिए, बीस फुट दूर देखें। आँखों की थकान घटाने का यह सबसे आसान और वैज्ञानिक तरीक़ा है। **चौथा — भोजन के समय फ़ोन मेज़ से बाहर।** बिना स्क्रीन के खाया गया भोजन बेहतर पचता है, और परिवार या साथियों से जुड़ाव भी बढ़ता है। **पाँचवाँ — काम के लिए समय-खंड।** लगातार मल्टीटास्किंग के बजाय पच्चीस से पैंतालीस मिनट के केंद्रित खंड बनाएँ, बीच में छोटा ब्रेक लें। इससे उतना ही काम कम थकान में पूरा होता है। **छठा — सप्ताह में एक "हल्का दिन"।** पूरे दिन का डिजिटल उपवास सबके लिए व्यावहारिक नहीं होता, लेकिन सप्ताह में एक दिन सोशल मीडिया से दूरी बनाना ज़्यादातर लोगों के लिए संभव है। ## नींद को प्राथमिकता देना ही सबसे बड़ा निवेश नींद पर हो रही कटौती का असर सिर्फ़ थकान तक सीमित नहीं रहता। पर्याप्त नींद न मिलने पर एकाग्रता घटती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, भूख के हार्मोन असंतुलित होते हैं और लंबे समय में मेटाबॉलिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है। युवाओं के लिए सात से नौ घंटे की नींद आदर्श मानी जाती है। नींद सुधारने के लिए कुछ बुनियादी बातें: सोने और उठने का समय हर दिन लगभग एक जैसा रखें, शाम के बाद चाय-कॉफ़ी से बचें, कमरे को अँधेरा और ठंडा रखें, और बिस्तर का इस्तेमाल केवल सोने के लिए करें — पढ़ाई या काम के लिए नहीं। ## "स्लीप टूरिज़्म" जैसे नए चलन नींद की कमी इतनी आम हो चुकी है कि अब इसके इर्द-गिर्द यात्रा का एक नया चलन खड़ा हो गया है — स्लीप टूरिज़्म। इसमें लोग घूमने-फिरने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ़ ठीक से सोने और आराम करने के लिए शांत जगहों पर जाते हैं। भारत में भी पहाड़ी और ग्रामीण इलाक़ों के छोटे होमस्टे इस माँग को पूरा करते दिख रहे हैं। यह चलन अपने आप में इस बात का संकेत है कि आराम अब विलासिता नहीं, ज़रूरत के तौर पर देखा जाने लगा है। हालाँकि विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि साल में एक बार की छुट्टी रोज़ाना की ख़राब आदतों की भरपाई नहीं कर सकती — असली बदलाव रोज़मर्रा की दिनचर्या में ही आना चाहिए। ## करियर और संतुलन को लेकर बदलती सोच दिलचस्प बात यह है कि भारत में जेन-ज़ी महत्वाकांक्षा में पीछे नहीं है। सर्वेक्षणों के अनुसार बड़ी संख्या में युवा नेतृत्व और प्रबंधन की भूमिकाओं तक पहुँचना चाहते हैं। लेकिन उनकी प्राथमिकताओं का क्रम बदला है — पद के आकर्षक नाम से ज़्यादा महत्व अब स्वस्थ कार्य-जीवन संतुलन और दीर्घकालिक आर्थिक स्वतंत्रता को दिया जा रहा है। यही कारण है कि नौकरी चुनते समय युवा अब वेतन के साथ-साथ लचीले घंटे, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और छुट्टियों की नीति भी देख रहे हैं। संस्थानों के लिए यह संकेत है कि केवल वेतन बढ़ाकर प्रतिभा को रोकना अब पर्याप्त नहीं रहेगा। ## माता-पिता और संस्थानों की भूमिका किशोरों के मामले में सिर्फ़ "फ़ोन छीन लेना" काम नहीं करता; इससे अक्सर छिपकर उपयोग बढ़ जाता है। ज़्यादा कारगर तरीक़े ये हैं: - घर में स्क्रीन के लिए साझा नियम बनाएँ, जो बड़ों पर भी लागू हों। बच्चे नियम से ज़्यादा उदाहरण से सीखते हैं। - खाने की मेज़ और शयनकक्ष को "नो-फ़ोन ज़ोन" घोषित करें। - बच्चे की ऑनलाइन दुनिया में रुचि लें — वह क्या देखता है, किससे बात करता है — बिना ताना दिए, बातचीत के लहजे में। - खेल, संगीत, कला या किसी शारीरिक गतिविधि का ऐसा विकल्प दें जो स्क्रीन जितना ही आकर्षक लगे। दफ़्तरों के स्तर पर भी बदलाव ज़रूरी है — काम के घंटों के बाद संदेश न भेजने की संस्कृति, बैठकों की संख्या सीमित करना और अवकाश को सचमुच अवकाश रहने देना। ## निष्कर्ष तकनीक से दूर भागना न संभव है, न ज़रूरी। असली सवाल यह है कि नियंत्रण किसके हाथ में है — हमारे, या उन ऐप्स के जो हमारा ध्यान बेचकर चलते हैं। दिन में सिर्फ़ तीन छोटे बदलाव — सुबह का पहला घंटा स्क्रीन-मुक्त, ग़ैर-ज़रूरी नोटिफ़िकेशन बंद, और सोने से एक घंटा पहले डिजिटल सनसेट — अधिकांश लोगों के लिए नींद, मनोदशा और एकाग्रता में कुछ ही हफ़्तों में साफ़ फ़र्क़ ला देते हैं। नई पीढ़ी ने समस्या को पहचान लिया है; अब बात सिर्फ़ रोज़ाना की छोटी-छोटी सीमाएँ तय करने की है। और इसकी शुरुआत आज रात, फ़ोन को बिस्तर से थोड़ा दूर रखकर, की जा सकती है। ## अक्सर पूछे जाने वाले सवाल **कितना स्क्रीन टाइम "सामान्य" माना जाए?** कोई एक जादुई आँकड़ा नहीं है। ज़्यादा अहम यह है कि स्क्रीन का समय आपकी नींद, भोजन, व्यायाम और आमने-सामने के रिश्तों में कटौती कर रहा है या नहीं। अगर इनमें से कोई भी प्रभावित हो रहा है, तो समय घटाने की ज़रूरत है — चाहे कुल आँकड़ा कुछ भी हो। **क्या नाइट मोड या ब्लू-लाइट फ़िल्टर से नींद ठीक हो जाती है?** इनसे आँखों को थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन नींद पर असर सीमित होता है। नींद बिगड़ने का बड़ा कारण रोशनी से ज़्यादा मानसिक उत्तेजना है — यानी आप स्क्रीन पर देख क्या रहे हैं। इसलिए फ़िल्टर के भरोसे रहने के बजाय सोने से पहले उपयोग ही बंद करना अधिक कारगर है। **बच्चों के लिए सबसे व्यावहारिक नियम क्या है?** "नो-फ़ोन ज़ोन" और "नो-फ़ोन टाइम" — यानी खाने की मेज़ व शयनकक्ष में फ़ोन नहीं, और सोने से एक घंटा पहले सबका फ़ोन बंद। नियम पूरे परिवार पर समान रूप से लागू हो, तभी बच्चे उसे स्वीकार करते हैं। **क्या पूरी तरह सोशल मीडिया छोड़ देना बेहतर है?** ज़्यादातर लोगों के लिए यह न ज़रूरी है, न टिकाऊ। बेहतर तरीक़ा है — उपयोग का उद्देश्य तय करना (किससे जुड़ना है, क्या सीखना है), समय की सीमा लगाना, और उन खातों को हटाना जो लगातार तुलना या चिंता बढ़ाते हैं।











Ravi Tunna
