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23 जुलाई 2026 · नई दिल्लीई-पेपरलॉगिन
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शेयर बाजार धड़ाम: सेंसेक्स 715 अंक लुढ़का, निफ्टी 24,000 के नीचे बंद

अमेरिका-ईरान तनाव, महँगा क्रूड और FII की बिकवाली से बाजार में भारी गिरावट

शेयर बाजार धड़ाम: सेंसेक्स 715 अंक लुढ़का, निफ्टी 24,000 के नीचे बंद

घरेलू शेयर बाजार के लिए गुरुवार, 23 जुलाई का दिन बेहद भारी साबित हुआ। दिनभर चली जोरदार बिकवाली के बाद बीएसई का सेंसेक्स 715.06 अंक यानी 0.92 प्रतिशत लुढ़ककर 76,755.05 के स्तर पर बंद हुआ। एनएसई का निफ्टी50 भी 191.45 अंक यानी 0.79 प्रतिशत टूटकर 23,996.25 पर आ गया। इस गिरावट के साथ निफ्टी 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर के नीचे फिसल गया, जिसे बाजार के जानकार आने वाले दिनों के लिए एक अहम संकेत मान रहे हैं।

शेयर बाजार में इस बड़ी गिरावट की कोई एक वजह नहीं रही। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव, 96 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचे ब्रेंट क्रूड, कमजोर होते रुपये और विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की लगातार बिकवाली ने मिलकर बाजार का मूड पूरी तरह बिगाड़ दिया। नतीजा यह रहा कि निवेशक जोखिम वाले सौदों से दूरी बनाते दिखे और हर उछाल पर बिकवाली हावी रही।

खास बात यह है कि यह गिरावट ऐसे समय आई है जब कंपनियों के पहली तिमाही यानी क्यू1 एफवाई27 के नतीजों का सीजन चल रहा है। ऐसे माहौल में कमजोर वैश्विक संकेत और घरेलू स्तर पर मुनाफावसूली, दोनों ने मिलकर बाजार पर दोहरी चोट की। आइए विस्तार से समझते हैं कि आज बाजार में क्या-क्या हुआ, किन शेयरों और सेक्टरों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा और आगे निवेशकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

आज के कारोबार की पूरी तस्वीर

सुबह बाजार की शुरुआत ही कमजोरी के साथ हुई थी। एशियाई बाजारों से मिले नरम संकेतों और कच्चे तेल की चढ़ती कीमतों ने शुरुआती कारोबार से ही धारणा पर दबाव बना दिया। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, बिकवाली का दायरा बढ़ता गया और दोपहर के सत्र में सेंसेक्स-निफ्टी दिन के निचले स्तरों की ओर खिसकते चले गए। बीच-बीच में सुधार की हल्की कोशिशें जरूर हुईं, लेकिन हर बार बिकवाल हावी हो गए।

कारोबार के आखिरी घंटे में गिरावट और गहरी हो गई। निफ्टी ने जैसे ही 24,000 का स्तर तोड़ा, बाजार में घबराहट बढ़ गई और कई सौदों में स्टॉप लॉस ट्रिगर होने से बिकवाली में और तेजी आ गई। अंत में सेंसेक्स 76,755.05 और निफ्टी 23,996.25 पर बंद हुआ। बाजार की चौड़ाई भी बेहद कमजोर रही, यानी बढ़ने वाले शेयरों के मुकाबले गिरने वाले शेयरों की संख्या काफी ज्यादा रही।

मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखने को मिला, हालांकि कुछ चुनिंदा शेयरों में निचले स्तरों पर खरीदारी लौटती दिखी। जानकारों का कहना है कि जब तक वैश्विक मोर्चे पर स्थिरता नहीं आती, तब तक छोटे और मझोले शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, इसलिए इस सेगमेंट में बेहद सोच-समझकर कदम रखने की जरूरत है।

गिरावट की चार बड़ी वजहें

पहली और सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान के बीच चरम पर पहुंचा तनाव है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार खाड़ी क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ने से दुनियाभर के निवेशक जोखिम से बचने की रणनीति अपना रहे हैं। ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से पैसा निकलकर सोना और डॉलर जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर जाता है, और भारत भी इस रुझान से अछूता नहीं रहा।

दूसरी वजह कच्चे तेल की कीमतें हैं, जो ब्रेंट क्रूड के 96 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल जाने से साफ दिखती हैं। तीसरी वजह रुपये की कमजोरी है, जिससे आयात महंगा होता है और विदेशी निवेशकों का असल रिटर्न घटता है। चौथी वजह एफआईआई की लगातार बिकवाली है, जो पिछले कई सत्रों से भारतीय शेयरों में शुद्ध बिकवाल बने हुए हैं।

इन चारों वजहों का एक साथ आना ही आज की गिरावट को इतना तीखा बना गया। जानकार बताते हैं कि बाजार एक-दो नकारात्मक खबरों को तो पचा लेता है, लेकिन जब भूराजनीतिक तनाव, महंगा तेल, कमजोर मुद्रा और विदेशी बिकवाली एक ही समय पर सिर उठाते हैं, तो सूचकांकों में इस तरह की तेज गिरावट देखने को मिलती है।

शेयर बाजार पर कच्चे तेल की मार

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात से पूरा करता है, इसलिए क्रूड की हर बड़ी तेजी शेयर बाजार के लिए बुरी खबर मानी जाती है। महंगा तेल सीधे तौर पर व्यापार घाटा बढ़ाता है, महंगाई को हवा देता है और कंपनियों की लागत बढ़ाकर उनके मुनाफे पर दबाव डालता है। यही वजह है कि क्रूड की चाल पर बाजार की नजर हमेशा टिकी रहती है।

पेंट, टायर, एविएशन और लॉजिस्टिक्स जैसी कंपनियों के लिए कच्चा तेल और उससे जुड़े उत्पाद बड़ी लागत होते हैं। वहीं तेल विपणन कंपनियों की चिंता यह होती है कि अगर खुदरा कीमतें नहीं बढ़ाई गईं तो उनका घाटा बढ़ेगा। यही वजह है कि ब्रेंट के 96 डॉलर पार जाते ही इन सेक्टरों के शेयरों में चौतरफा घबराहट फैल गई।

अगर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल की सप्लाई में और रुकावट आती है, तो क्रूड की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में बाजार के लिए आने वाले दिनों में कच्चे तेल की चाल सबसे बड़ा ट्रिगर बनी रहेगी। जानकारों का मानना है कि क्रूड में हर नई तेजी के साथ बाजार की बेचैनी बढ़ती जाएगी।

सबसे ज्यादा टूटे ये दिग्गज शेयर

आज की गिरावट में सबसे ज्यादा चोट डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के निवेशकों को लगी, जिसका शेयर करीब 9 प्रतिशत तक लुढ़क गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका में जेनेरिक दवाओं पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की आशंका ने पूरे फार्मा सेक्टर की धारणा बिगाड़ दी, और इसका सबसे ज्यादा असर इसी दिग्गज शेयर पर देखने को मिला।

नेस्ले इंडिया और इंफोसिस भी आज के टॉप लूजर्स की सूची में शामिल रहे। आईटी शेयरों में कमजोरी की वजह वैश्विक मांग को लेकर बढ़ती चिंता रही, जबकि नेस्ले जैसे शेयरों में ऊंचे स्तरों से मुनाफावसूली देखी गई। इन दिग्गज शेयरों की गिरावट ने सूचकांकों को नीचे खींचने में बड़ी भूमिका निभाई, क्योंकि सूचकांक में इनका वजन काफी ज्यादा है।

किन सेक्टरों में कमजोरी किनमें मजबूती

सेक्टोरल मोर्चे पर आज फार्मा, रियल्टी और हेल्थकेयर इंडेक्स सबसे ज्यादा दबाव में रहे। फार्मा शेयरों पर टैरिफ की आशंका भारी पड़ी, जबकि रियल्टी शेयरों में ऊंची लागत और महंगाई की चिंता के चलते बिकवाली दिखी। हेल्थकेयर सेक्टर भी फार्मा की कमजोरी के साथ-साथ नीचे आया और इन तीनों सेक्टरों के ज्यादातर शेयर लाल निशान में बंद हुए।

दूसरी ओर एफएमसीजी और ऑटो सेक्टर का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर रहा। जानकारों का मानना है कि अनिश्चितता के दौर में निवेशक रोजमर्रा की खपत से जुड़ी कंपनियों में सुरक्षा तलाशते हैं। ऑटो शेयरों को ग्रामीण मांग में सुधार की उम्मीद और त्योहारी सीजन से पहले की तैयारियों का सहारा मिला, जिससे इस सेक्टर में गिरावट सीमित रही।

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली

एफआईआई की बिकवाली इस समय बाजार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विदेशी निवेशक पिछले कई सत्रों से भारतीय शेयरों में लगातार शुद्ध बिकवाल बने हुए हैं। वैश्विक अनिश्चितता के इस माहौल में वे उभरते बाजारों में अपना जोखिम घटा रहे हैं और भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों की ओर ले जा रहे हैं।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर की मजबूती भी विदेशी पैसे की निकासी की अहम वजह बनती है। हालांकि राहत की बात यह है कि घरेलू संस्थागत निवेशक और खुदरा निवेशक गिरावट पर खरीदारी करते रहे हैं, जिससे बाजार को एक हद तक सहारा मिल रहा है। एसआईपी के जरिये हर महीने आने वाला निवेश भारतीय बाजार की बुनियाद को लगातार मजबूती दे रहा है।

जानकारों का कहना है कि जिस दिन एफआईआई की बिकवाली थमेगी या वे खरीदारी की ओर लौटेंगे, बाजार में तेज रिकवरी देखने को मिल सकती है। इसलिए आने वाले दिनों में विदेशी निवेश के आंकड़ों पर बाजार की बारीक नजर बनी रहेगी।

कमजोर रुपये का दोहरा दबाव

डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी बाजार के लिए दोहरी मुसीबत लेकर आती है। एक तरफ इससे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी आयातित चीजें महंगी हो जाती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। दूसरी तरफ विदेशी निवेशकों का डॉलर में आंका जाने वाला रिटर्न घट जाता है, जिससे वे और तेजी से बिकवाली की ओर बढ़ते हैं।

हालांकि कमजोर रुपया आईटी और फार्मा जैसे निर्यातकों के लिए आम तौर पर फायदेमंद माना जाता है, लेकिन मौजूदा माहौल में टैरिफ की आशंका और वैश्विक मांग की चिंता ने यह फायदा भी धुंधला कर दिया है। यही वजह है कि आज निर्यात आधारित शेयर भी गिरावट से नहीं बच सके और पूरे बाजार में चौतरफा दबाव देखने को मिला।

नतीजों के सीजन पर टिकी निगाहें

बाजार इस समय वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी क्यू1 एफवाई27 के नतीजों के सीजन से गुजर रहा है। ऐसे में कंपनियों के मुनाफे, मार्जिन और प्रबंधन की टिप्पणियों पर निवेशकों की बारीक नजर है। जिन कंपनियों के नतीजे उम्मीद से कमजोर आ रहे हैं, उनके शेयरों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

जानकारों का कहना है कि जब बाजार का मूड पहले से नरम हो, तब नतीजों में छोटी सी निराशा भी बड़ी गिरावट की वजह बन जाती है। आने वाले दिनों में बैंकिंग, आईटी और एफएमसीजी की दिग्गज कंपनियों के नतीजे बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। अच्छे नतीजे बाजार को सहारा दे सकते हैं, जबकि कमजोर आंकड़े गिरावट को और गहरा कर सकते हैं।

शेयर बाजार में छोटे निवेशकों की रणनीति

ऐसे उतार-चढ़ाव भरे दौर में छोटे निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे घबराहट में कोई फैसला न लें। जानकार मानते हैं कि गिरावट देखकर डर में पूरी होल्डिंग बेच देना या एक साथ बड़ी रकम लगा देना, दोनों ही नुकसानदेह हो सकते हैं। एसआईपी जारी रखना और अच्छी गुणवत्ता वाले शेयरों में चरणबद्ध तरीके से निवेश करना बेहतर रणनीति मानी जाती है।

पोर्टफोलियो में विविधता यानी डायवर्सिफिकेशन इस समय सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। इक्विटी के साथ सोना और डेट जैसे विकल्पों का संतुलन जोखिम घटाता है। साथ ही उधार के पैसे से या भारी लिवरेज लेकर ट्रेडिंग करने से बचना चाहिए, क्योंकि अस्थिर बाजार में यह छोटे निवेशकों को भारी नुकसान करा सकता है।

लंबी अवधि का नजरिया रखने वाले निवेशकों के लिए ऐसी गिरावटें ऐतिहासिक रूप से अच्छे मौके साबित होती रही हैं। शर्त सिर्फ यह है कि निवेश मजबूत कारोबार वाली कंपनियों में हो और पैसा ऐसी रकम से लगाया जाए जिसकी जरूरत निकट भविष्य में न पड़े।

तकनीकी नजरिये से अहम स्तर

तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक निफ्टी के लिए 24,000 का स्तर अब बड़ा प्रतिरोध बन गया है। जब तक सूचकांक दोबारा इस स्तर के ऊपर टिककर बंद नहीं होता, तब तक बाजार में हर उछाल पर बिकवाली का दबाव बना रह सकता है। नीचे की ओर बाजार की नजर अगले मजबूत सपोर्ट स्तरों पर रहेगी, जहां से खरीदारी लौटने की उम्मीद की जा सकती है।

सेंसेक्स के लिए भी 77,000 के नीचे बंद होना कमजोरी का संकेत माना जा रहा है। वोलैटिलिटी में बढ़ोतरी बताती है कि आने वाले सत्रों में भी बाजार में तेज उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। ऐसे में ट्रेडर्स को सख्त स्टॉप लॉस के साथ ही कारोबार करने और ओवरनाइट जोखिम सीमित रखने की सलाह दी जा रही है।

आगे क्या

आने वाले दिनों में शेयर बाजार की दिशा मुख्य रूप से तीन बातों से तय होगी। पहली, अमेरिका-ईरान तनाव का रुख और कच्चे तेल की चाल। दूसरी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली थमती है या नहीं। और तीसरी, तिमाही नतीजों में दिग्गज कंपनियों का प्रदर्शन कैसा रहता है। इन तीनों मोर्चों पर आने वाली हर खबर बाजार में बड़ी हलचल पैदा कर सकती है।

अगर खाड़ी में तनाव घटता है और क्रूड नरम पड़ता है, तो बाजार में तेज रिकवरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जानकारों की सलाह साफ है, गुणवत्ता वाली कंपनियों पर भरोसा रखें, गिरावट को अवसर की तरह देखें, लेकिन निवेश हमेशा अपनी जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से ही करें। बाजार में धैर्य ही सबसे बड़ी पूंजी है।

Arjun Patel
Journalist · The Inside Journal
सच्चाई सामने लाने और पाठकों तक असरदार ख़बरें पहुँचाने के प्रति समर्पित।
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