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23 जुलाई 2026 · नई दिल्लीई-पेपरलॉगिन
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असम बाढ़ त्रासदी: एक ही दिन में 21 मौतें, मृतकों का आंकड़ा 31 पहुंचा, लाखों लोग प्रभावित

लगातार बारिश से ब्रह्मपुत्र समेत कई नदियां उफान पर, हजारों परिवार राहत शिविरों में; NDRF-SDRF की टीमें युद्धस्तर पर बचाव अभियान में जुटीं

असम बाढ़ त्रासदी: एक ही दिन में 21 मौतें, मृतकों का आंकड़ा 31 पहुंचा, लाखों लोग प्रभावित

गुवाहाटी: असम बाढ़ की त्रासदी ने उस समय और भयावह रूप ले लिया, जब बीते 24 घंटों के भीतर राज्य में 21 लोगों की मौत की खबर सामने आई। इसके साथ ही असम में बाढ़ से जान गंवाने वालों की कुल संख्या बढ़कर 31 हो गई है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण ब्रह्मपुत्र समेत कई नदियां उफान पर हैं और राज्य के बड़े हिस्से में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। लाखों लोग इस आपदा की चपेट में हैं और हजारों परिवार अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में निकलने को मजबूर हुए हैं। राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियां युद्धस्तर पर राहत-बचाव अभियान चला रही हैं। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF और राज्य आपदा मोचन बल SDRF की टीमें प्रभावित इलाकों में नावों और जरूरी उपकरणों के साथ तैनात की गई हैं। बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम दिन-रात जारी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई इलाकों में हालात इतने गंभीर हैं कि लोगों को घरों की छतों और ऊंचे स्थानों से नावों के जरिए निकालना पड़ रहा है। मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में भी भारी बारिश की आशंका जताई है, जिससे प्रशासन की चुनौती और बढ़ गई है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि हर साल दोहराई जाने वाली इस त्रासदी से निपटने के लिए दीर्घकालिक समाधान आखिर कब निकलेगा। फिलहाल राज्य का पूरा तंत्र राहत और बचाव में जुटा है, लेकिन प्रभावित परिवारों का दर्द और नुकसान का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। असम बाढ़ का बढ़ता दायरा बीते एक दिन में 21 मौतों के आंकड़े ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। किसी एक दिन में इतनी बड़ी संख्या में जानों का जाना इस बात का संकेत है कि बाढ़ का पानी कितनी तेजी से और कितने बड़े इलाके में फैला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मरने वालों में कई लोग पानी के तेज बहाव में बह गए, जबकि कुछ मौतें घर या दीवार गिरने जैसी घटनाओं में हुई बताई जा रही हैं। राज्य में बाढ़ से अब तक कुल 31 लोगों की जान जा चुकी है और यह आंकड़ा प्रशासन के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, जहां खेत-खलिहान पूरी तरह डूब चुके हैं और कच्चे मकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। सड़कों और पुल-पुलियों के क्षतिग्रस्त होने से कई गांवों का संपर्क मुख्यालयों से कट गया है, जिससे राहत सामग्री पहुंचाने में भी मुश्किलें आ रही हैं। शहरी इलाकों में भी जलभराव ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई निचली बस्तियों में पानी घरों के अंदर तक घुस गया है। बिजली आपूर्ति और पेयजल व्यवस्था पर असर पड़ा है और कई जगह स्कूल-कॉलेजों में पठन-पाठन ठप हो गया है। लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर बारिश का यह सिलसिला नहीं थमा, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। ब्रह्मपुत्र का जलस्तर खतरे के निशान पर असम की जीवनरेखा कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी इस समय कई स्थानों पर खतरे के निशान के आसपास या उससे ऊपर बह रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ब्रह्मपुत्र के साथ-साथ उसकी सहायक नदियों का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है, जिससे नदी किनारे बसे गांवों और कस्बों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। तटबंधों पर दबाव बढ़ने की खबरें भी सामने आ रही हैं और प्रशासन संवेदनशील तटबंधों की चौबीसों घंटे निगरानी करवा रहा है। जानकार बताते हैं कि ब्रह्मपुत्र का चरित्र ही ऐसा है कि मॉनसून के दौरान इसका जलस्तर बहुत तेजी से बढ़ता है। पहाड़ों से आने वाला पानी, ऊपरी इलाकों की बारिश और सहायक नदियों का बहाव मिलकर मैदानी इलाकों में बाढ़ की स्थिति पैदा कर देते हैं। यही वजह है कि नदी किनारे के इलाकों में रहने वाले लोगों को हर साल इस मौसम में विस्थापन का दर्द झेलना पड़ता है। नदी के जलस्तर में उतार-चढ़ाव को देखते हुए प्रशासन ने नाव संचालन और मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों को लेकर भी सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। तेज बहाव में किसी भी तरह का जोखिम जानलेवा साबित हो सकता है, इसलिए लोगों से नदी के करीब न जाने की अपील की जा रही है। राहत शिविरों में शरण लेते परिवार बाढ़ प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में राहत शिविर बनाए गए हैं, जहां हजारों परिवारों ने शरण ली है। इन शिविरों में भोजन, पीने का साफ पानी, दवाइयां और बच्चों के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई शिविरों में क्षमता से अधिक लोग पहुंच रहे हैं, जिससे व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा है। राहत शिविरों में रह रहे लोगों की कहानियां बेहद मार्मिक हैं। किसी ने अपनी फसल खोई है, तो किसी का पूरा घर पानी में समा गया है। मवेशियों को बचाने की जद्दोजहद अलग है, क्योंकि ग्रामीण परिवारों के लिए पशुधन ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। कई जगह लोगों ने ऊंचे तटबंधों, सड़कों और स्कूल भवनों में अस्थायी डेरा डाल रखा है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें शिविरों में नियमित जांच कर रही हैं, ताकि दूषित पानी से होने वाली बीमारियों को फैलने से रोका जा सके। बाढ़ के बाद डायरिया, त्वचा रोग और मच्छर जनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए साफ-सफाई और क्लोरीन युक्त पानी की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। NDRF और SDRF का बचाव अभियान राहत-बचाव अभियान में NDRF और SDRF की टीमें सबसे अग्रिम मोर्चे पर हैं। प्रभावित इलाकों में मोटरबोट और रबर बोट के जरिए फंसे हुए लोगों को निकाला जा रहा है। बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और बीमार लोगों को प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई इलाकों में बचाव दलों ने जोखिम भरे हालात में भी लोगों की जान बचाई है। स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर ये टीमें उन दूरदराज के गांवों तक भी पहुंचने की कोशिश कर रही हैं, जहां संपर्क मार्ग टूट चुके हैं। ऐसे इलाकों में खाने के पैकेट, पीने का पानी और जरूरी दवाइयां पहुंचाई जा रही हैं। बचाव अभियान में स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका भी सराहनीय रही है, जो अपने स्तर पर लोगों की मदद कर रहे हैं। बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लगातार हो रही बारिश और पानी का तेज बहाव है। कई बार मौसम खराब होने से अभियान की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, लेकिन टीमें हालात सामान्य होने का इंतजार किए बिना वैकल्पिक रास्तों से राहत पहुंचाने में जुटी हैं। प्रशासन की अपील और तैयारियां राज्य प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों से कहा गया है कि वे चेतावनी मिलते ही सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाएं और किसी भी हालत में बाढ़ के पानी में उतरने का जोखिम न लें। बच्चों को पानी के पास न जाने देने की विशेष हिदायत दी गई है। जिला स्तर पर कंट्रोल रूम सक्रिय कर दिए गए हैं, जहां से राहत कार्यों की निगरानी की जा रही है। हेल्पलाइन नंबरों के जरिए लोग मदद मांग सकते हैं। प्रशासन ने यह भी कहा है कि राहत सामग्री के वितरण में पारदर्शिता बरती जाएगी और कोई भी प्रभावित परिवार मदद से वंचित नहीं रहेगा। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त सड़कों, पुलों और तटबंधों की अस्थायी मरम्मत का काम भी शुरू कर दिया गया है, ताकि राहत सामग्री की आवाजाही बनी रहे। बिजली और संचार व्यवस्था बहाल करने के लिए भी टीमें लगाई गई हैं। असम बाढ़ और जलवायु परिवर्तन का रिश्ता जानकारों का मानना है कि असम बाढ़ की समस्या केवल एक मौसमी आपदा नहीं, बल्कि बदलते जलवायु पैटर्न का भी नतीजा है। पिछले कुछ वर्षों में मॉनसून का मिजाज तेजी से बदला है। अब बारिश लंबे समय तक धीरे-धीरे होने के बजाय कम समय में बहुत तेज होती है, जिसे अतिवृष्टि कहा जाता है। इस तरह की बारिश नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ा देती है और बाढ़ की विभीषिका कई गुना बढ़ जाती है। पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति इसे और संवेदनशील बनाती है। पहाड़ी इलाकों में हुई बारिश का पानी तेजी से मैदानों की ओर आता है। वनों की कटाई, नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण और शहरीकरण ने पानी के निकलने के प्राकृतिक रास्तों को संकरा कर दिया है। नतीजा यह है कि पानी बस्तियों में घुसता है और तबाही मचाता है। पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अगर जलवायु परिवर्तन के असर को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो बाढ़ जैसी आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ती जाएंगी। ऐसे में आपदा प्रबंधन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाना भी उतना ही जरूरी है। हर साल दोहराता त्रासदी का चक्र असम के लिए बाढ़ कोई नई बात नहीं है। हर साल मॉनसून के मौसम में राज्य का बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाता है। पिछले वर्षों में भी बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया है और जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। खेती-किसानी पर निर्भर परिवारों के लिए यह हर साल की त्रासदी बन चुकी है, क्योंकि खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं और अगली फसल तक का सहारा छिन जाता है। काजीरंगा जैसे राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव क्षेत्रों पर भी बाढ़ का असर पड़ता रहा है, जहां जानवरों को ऊंचे स्थानों की ओर पलायन करना पड़ता है। यह पूरी पारिस्थितिकी के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तटबंधों की मजबूती, नदियों की ड्रेजिंग, बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली का विस्तार और बाढ़ अनुकूल बुनियादी ढांचे जैसे दीर्घकालिक उपायों पर लगातार काम करने की जरूरत है। केवल आपदा आने के बाद राहत बांटने से इस चक्र को तोड़ा नहीं जा सकता। प्रभावित लोगों के लिए जरूरी सलाह बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को कुछ बुनियादी सावधानियां जरूर बरतनी चाहिए। सबसे पहले, पीने के लिए हमेशा उबला हुआ या क्लोरीन युक्त पानी ही इस्तेमाल करें, क्योंकि बाढ़ के दौरान जलजनित बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा होता है। बिजली के खंभों, तारों और पानी में डूबे बिजली उपकरणों से दूर रहें। जरूरी दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड, जमीन के कागजात और बैंक पासबुक को वाटरप्रूफ थैली में सुरक्षित रखें। मोबाइल फोन चार्ज रखें और आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर नोट कर लें। घर छोड़ते समय गैस सिलेंडर और बिजली का मुख्य स्विच बंद करना न भूलें। सांप और अन्य जहरीले जीव-जंतु बाढ़ के पानी के साथ रिहायशी इलाकों में आ सकते हैं, इसलिए रात में सोते समय और अंधेरे में चलते समय सतर्क रहें। किसी भी स्वास्थ्य समस्या को नजरअंदाज न करें और नजदीकी स्वास्थ्य शिविर में तुरंत संपर्क करें। बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। आगे क्या होगा फिलहाल असम के लिए अगले कुछ दिन बेहद अहम हैं। मौसम विभाग की भारी बारिश की चेतावनी को देखते हुए प्रशासन ने सभी जिलों को अलर्ट पर रखा है। अगर बारिश की रफ्तार धीमी पड़ती है, तो नदियों का जलस्तर घटने के साथ राहत कार्यों में तेजी आएगी और लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौट सकेंगे। लेकिन अगर बारिश जारी रही, तो प्रभावितों की संख्या और बढ़ सकती है। राज्य सरकार की ओर से नुकसान के आकलन की प्रक्रिया भी जल्द शुरू होने की उम्मीद है, जिसके आधार पर प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास सहायता दी जाएगी। केंद्र सरकार की ओर से भी हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया गया है। इस बीच पूरे देश की निगाहें असम पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि यह संकट जल्द टलेगा। द इनसाइड जर्नल की टीम इस त्रासदी से जुड़ी हर बड़ी अपडेट पर नजर बनाए हुए है और पाठकों तक सटीक जानकारी पहुंचाती रहेगी।

Rohit Sharma
Journalist · The Inside Journal
सच्चाई सामने लाने और पाठकों तक असरदार ख़बरें पहुँचाने के प्रति समर्पित।
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