विजय की TVK ने उठाई NEET पूरी तरह खत्म करने की मांग, तमिलनाडु में फिर गरमाई प्रवेश परीक्षा की सियासत
दक्षिण की राजनीति में NEET विरोध का लंबा इतिहास; राज्य बनाम केंद्र की बहस के बीच 2026 के सियासी समीकरणों पर पड़ सकता है बड़ा असर

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में NEET का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम यानी TVK ने मांग की है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। देशभर में NEET पेपर लीक को लेकर मचे घमासान के बीच TVK की इस मांग ने दक्षिण की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। पार्टी का कहना है कि यह परीक्षा सामाजिक न्याय के खिलाफ है और राज्यों से उनके अधिकार छीनती है। TVK की यह मांग ऐसे समय आई है, जब NEET की विश्वसनीयता पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। पेपर लीक के आरोपों, देशव्यापी छात्र आंदोलन और संसद में जारी गतिरोध ने इस परीक्षा को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। ऐसे माहौल में तमिलनाडु से उठी यह आवाज केवल एक पार्टी का बयान नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में लंबे समय से चली आ रही NEET विरोधी भावना की नई अभिव्यक्ति मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विजय ने इस मुद्दे को उठाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक तरफ उन्होंने छात्रों और अभिभावकों की नाराजगी को आवाज दी है, तो दूसरी तरफ खुद को तमिल अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति की मुख्यधारा में खड़ा कर दिया है। आइए समझते हैं कि यह मांग क्यों अहम है और इसके सियासी मायने क्या हैं। TVK की मांग, NEET पूरी तरह खत्म हो TVK ने अपने बयान में साफ कहा है कि NEET को केवल सुधारने या टालने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसे पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि यह परीक्षा ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए एक बड़ी बाधा बन गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पार्टी ने राज्य के छात्रों के हितों की रक्षा के लिए मेडिकल दाखिलों का अधिकार राज्यों को लौटाने की वकालत की है। विजय की पार्टी का मानना है कि स्कूली शिक्षा के अंकों के आधार पर दाखिले की पुरानी व्यवस्था अधिक न्यायसंगत थी, क्योंकि उसमें महंगी कोचिंग की भूमिका नहीं थी। TVK का आरोप है कि NEET ने मेडिकल शिक्षा को कोचिंग उद्योग के हवाले कर दिया है, जहां सफलता की कीमत लाखों रुपये है और यह कीमत हर परिवार नहीं चुका सकता। पेपर लीक विवाद ने TVK की इस दलील को और धार दे दी है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जब परीक्षा की शुचिता ही संदिग्ध है, तो इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार क्यों नहीं होना चाहिए। पार्टी ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच बड़े स्तर पर ले जाएगी। तमिलनाडु में NEET विरोध का लंबा इतिहास तमिलनाडु में NEET का विरोध कोई नई परिघटना नहीं है। यह राज्य शुरुआत से ही इस परीक्षा के सबसे मुखर विरोधियों में रहा है। राज्य की प्रमुख द्रविड़ पार्टियां लंबे समय से यह मांग करती रही हैं कि तमिलनाडु को NEET से छूट दी जाए। राज्य विधानसभा में इस आशय के प्रस्ताव और विधेयक भी पारित किए जा चुके हैं, जिनमें मेडिकल दाखिलों को स्कूली अंकों के आधार पर करने की व्यवस्था बहाल करने की बात कही गई। राज्य की दलील रही है कि NEET ग्रामीण, गरीब और सरकारी स्कूलों के छात्रों के खिलाफ काम करती है। तमिलनाडु में इस मुद्दे पर विशेषज्ञ समितियों ने भी अध्ययन किया है और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन अध्ययनों में यह चिंता जताई गई कि NEET के बाद मेडिकल कॉलेजों में ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों की हिस्सेदारी प्रभावित हुई है। इस मुद्दे का भावनात्मक पहलू भी बेहद गहरा है। बीते वर्षों में परीक्षा से जुड़े तनाव के कारण छात्रों के दुखद कदम उठाने की घटनाओं ने पूरे राज्य को झकझोरा है। ऐसी हर घटना के बाद NEET विरोधी भावना और प्रबल हुई है। यही कारण है कि तमिलनाडु में NEET केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राज्य के अधिकारों से जुड़ा राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है। राज्य बनाम केंद्र, अधिकारों की लड़ाई NEET विवाद के मूल में राज्य और केंद्र के अधिकारों की पुरानी बहस है। शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, यानी इस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। NEET लागू होने से पहले राज्य अपने मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया खुद तय करते थे। एक राष्ट्रीय परीक्षा लागू होने के बाद राज्यों के हाथ से यह अधिकार व्यावहारिक रूप से निकल गया। तमिलनाडु समेत कई राज्यों का तर्क है कि स्थानीय परिस्थितियों, भाषा और पाठ्यक्रम की विविधता को एक केंद्रीकृत परीक्षा नजरअंदाज करती है। ग्रामीण छात्रों के लिए राष्ट्रीय स्तर के प्रतिस्पर्धी पैटर्न से तालमेल बिठाना आसान नहीं होता, जबकि संपन्न परिवारों के बच्चे महंगी कोचिंग के दम पर आगे निकल जाते हैं। इस तरह समान अवसर का सिद्धांत ही कमजोर पड़ता है। दूसरी ओर केंद्रीकृत परीक्षा के समर्थकों की दलील है कि एक समान राष्ट्रीय परीक्षा से पारदर्शिता बढ़ती है, कई परीक्षाओं का बोझ घटता है और मेडिकल शिक्षा में एक न्यूनतम स्तर सुनिश्चित होता है। यह बहस वर्षों से चल रही है, लेकिन पेपर लीक जैसे विवाद केंद्रीकृत व्यवस्था के पक्ष को कमजोर करते हैं, क्योंकि एक परीक्षा में गड़बड़ी का असर पूरे देश के छात्रों पर पड़ता है। दक्षिण की राजनीति में NEET एक भावनात्मक मुद्दा दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु की राजनीति में NEET एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रीय दल एकमत रहे हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति की गहरी जड़ों वाले इस राज्य में शिक्षा के अवसरों की समानता हमेशा से केंद्रीय विषय रही है। NEET को यहां व्यापक रूप से उस व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जो हाशिये के समुदायों के लिए अवसरों के दरवाजे संकरे करती है। यही वजह है कि चुनावी घोषणापत्रों से लेकर विधानसभा की बहसों तक NEET का विरोध बार-बार सामने आता रहा है। अब TVK के इस मुद्दे को आक्रामक ढंग से उठाने के बाद बाकी दलों पर भी अपनी स्थिति और स्पष्ट करने का दबाव बढ़ेगा। कोई भी दल इस मुद्दे पर पिछड़ता नहीं दिखना चाहेगा, क्योंकि यह सीधे-सीधे लाखों परिवारों की भावनाओं से जुड़ा प्रश्न है। राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे NEET पेपर लीक विवाद ने दक्षिण के इस पुराने असंतोष को नई वैधता दे दी है। अब तमिल राजनीति के नेता यह कहने की स्थिति में हैं कि जिन खतरों की ओर वे वर्षों से इशारा कर रहे थे, वे सही साबित हुए हैं। विजय की सियासी रणनीति के मायने फिल्मी पर्दे से राजनीति में उतरे विजय के लिए NEET का मुद्दा एक सोची-समझी सियासी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। तमिलनाडु की राजनीति में युवा और छात्र हमेशा से निर्णायक शक्ति रहे हैं। NEET विरोध के जरिए विजय सीधे इसी वर्ग से संवाद कर रहे हैं। उनकी लोकप्रियता का बड़ा आधार युवा प्रशंसक ही हैं और यह मुद्दा उन्हें प्रशंसक से समर्थक बनाने का माध्यम बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TVK इस मुद्दे के जरिए खुद को स्थापित द्रविड़ दलों के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है। पार्टी का संदेश साफ है कि वह केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि छात्रों के बुनियादी मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाएगी। पुराने दलों पर वह यह सवाल भी उठा सकती है कि दशकों की राजनीति के बावजूद वे इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं करा पाए। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। NEET को समाप्त करने का निर्णय राज्य के हाथ में नहीं है, इसके लिए केंद्रीय स्तर पर बदलाव जरूरी है। ऐसे में आलोचक यह पूछ सकते हैं कि TVK अपनी मांग को अमली जामा कैसे पहनाएगी। पार्टी के लिए असली परीक्षा यही होगी कि वह इस मुद्दे को केवल भावनात्मक अपील से आगे ले जाकर ठोस राजनीतिक दबाव में कैसे बदलती है। 2026 की राजनीति पर संभावित असर 2026 का साल तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है और ऐसे समय में NEET जैसे भावनात्मक मुद्दे का गरमाना सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। छात्रों और युवा मतदाताओं के बीच जिस दल की पकड़ मजबूत होगी, उसे आने वाले समय में इसका सीधा लाभ मिल सकता है। यही वजह है कि सभी दल इस मुद्दे पर अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे की गूंज साफ सुनाई दे रही है। संसद में जारी गतिरोध, विपक्ष के तीखे तेवर और देशव्यापी छात्र आंदोलन के बीच दक्षिण से उठी NEET समाप्ति की मांग केंद्र सरकार के लिए एक और चुनौती है। अगर यह मांग अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दलों को भी अपनी ओर खींचती है, तो केंद्र बनाम राज्य की यह बहस और व्यापक रूप ले सकती है। जानकारों का कहना है कि आने वाले महीनों में NEET का मुद्दा केवल शिक्षा नीति का नहीं, बल्कि संघीय ढांचे में राज्यों की स्वायत्तता का प्रश्न बनकर उभर सकता है। ऐसे में इसका असर तमिलनाडु की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर भी पड़ेगा। छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया TVK की मांग पर छात्रों और अभिभावकों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक बड़ा वर्ग इस मांग का समर्थन करता है, क्योंकि वह NEET को तनाव, खर्च और असमानता का कारण मानता है। ऐसे परिवारों का कहना है कि कोचिंग का बढ़ता खर्च और परीक्षा का दबाव उनके बच्चों के बचपन और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। वहीं कुछ छात्र और शिक्षाविद यह भी मानते हैं कि समाधान परीक्षा खत्म करने में नहीं, बल्कि उसे निष्पक्ष, सुरक्षित और सुलभ बनाने में है। उनका तर्क है कि किसी भी व्यवस्था में बदलाव से पहले यह सोचना जरूरी है कि विकल्प क्या होगा और वह मौजूदा व्यवस्था से बेहतर कैसे साबित होगा। इस बहस के बीच एक बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि मौजूदा स्थिति में बदलाव जरूरी है। पेपर लीक के आरोपों ने जिस तरह छात्रों का भरोसा हिलाया है, उसके बाद यथास्थिति बनाए रखना किसी के हित में नहीं है। आगे क्या होगा TVK की इस मांग के बाद अब निगाहें तमिलनाडु के अन्य राजनीतिक दलों और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। राज्य की द्रविड़ पार्टियां इस मुद्दे पर पहले से मुखर रही हैं, ऐसे में संभावना है कि आने वाले दिनों में NEET विरोध की आवाजें और तेज होंगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार TVK इस मुद्दे पर जनसंपर्क अभियान की योजना भी बना रही है। राष्ट्रीय स्तर पर NEET पेपर लीक विवाद जिस दिशा में जाएगा, उसका सीधा असर इस मांग के भविष्य पर पड़ेगा। अगर परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधारों की घोषणा होती है, तो बहस सुधार बनाम समाप्ति के बीच केंद्रित होगी। लेकिन अगर विवाद और गहराया, तो NEET को खत्म करने की मांग को नई ताकत मिल सकती है। फिलहाल इतना तय है कि तमिलनाडु की सियासत में NEET का मुद्दा आने वाले लंबे समय तक गूंजता रहेगा और विजय की TVK ने इस बहस में अपनी जगह मजबूती से दर्ज करा दी है।









