संसद में NEET पेपर लीक पर घमासान: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष, दोनों सदनों में हंगामा
लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही बार-बार बाधित; जेपी नड्डा के बयान से सरकार की पहली बड़ी प्रतिक्रिया, आने वाले दिनों में भी गतिरोध जारी रहने के आसार

नई दिल्ली: NEET पेपर लीक का मुद्दा गुरुवार को संसद में पूरी ताकत से गूंजा। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जोरदार हंगामा किया, जिसके चलते कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। विपक्षी सांसद नारेबाजी करते हुए वेल तक पहुंच गए और तख्तियां लहराकर सरकार से जवाब मांगते रहे। संसद परिसर से लेकर सदन के भीतर तक माहौल पूरी तरह गरमाया रहा और आसार साफ हैं कि आने वाले दिनों में भी यह गतिरोध जारी रहेगा। विपक्ष का आरोप है कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इतने बड़े मामले पर सरकार गंभीरता नहीं दिखा रही है। उसकी मांग है कि शिक्षा मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ें और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। वहीं सरकार की ओर से भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मोर्चा संभाला और इस पूरे विवाद पर सरकार की पहली बड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए सदन को व्यवस्थित ढंग से चलने देने की अपील की। संसद के बाहर देशभर में चल रहा छात्र आंदोलन इस टकराव को और धार दे रहा है। जंतर-मंतर से लेकर पटना तक सड़कों पर उतरे छात्रों की नाराजगी का सीधा असर संसद की कार्यवाही पर दिख रहा है। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए यह मुद्दा प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है। दोनों सदनों में बार-बार बाधित हुई कार्यवाही गुरुवार की सुबह जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सदस्यों ने NEET पेपर लीक पर चर्चा की मांग को लेकर हंगामा शुरू कर दिया। आसन की ओर से बार-बार शांति की अपील की गई, लेकिन नारेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही थी। हंगामे के चलते कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। कुछ ऐसा ही नजारा राज्यसभा में भी देखने को मिला, जहां विपक्षी सांसदों ने इस मुद्दे पर तत्काल चर्चा की मांग की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विपक्षी दलों ने दोनों सदनों में स्थगन प्रस्ताव के नोटिस देकर इस मुद्दे पर बाकी कामकाज रोककर चर्चा कराने की मांग की। सरकार का कहना है कि वह नियमों के तहत चर्चा से पीछे नहीं हट रही, लेकिन विपक्ष पहले सदन चलने दे। इसी खींचतान में संसद का कीमती समय हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। संसद के दोनों सदनों में जरूरी विधायी कामकाज भी इस गतिरोध की वजह से अटकता दिख रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो सत्र का बड़ा हिस्सा बिना ठोस कामकाज के निकल सकता है, जिसका खामियाजा अंतत जनता से जुड़े विधेयकों और मुद्दों को भुगतना पड़ेगा। NEET पेपर लीक पर इस्तीफे की मांग तेज विपक्ष की सबसे बड़ी और सबसे मुखर मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि जिस मंत्रालय की निगरानी में देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा होती है, उसकी शुचिता पर सवाल उठे हैं, तो जवाबदेही सबसे पहले मंत्री की बनती है। उनका कहना है कि नैतिकता के आधार पर मंत्री को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने प्रदर्शन भी किया, जिसमें उन्होंने छात्रों के साथ न्याय की मांग वाली तख्तियां हाथों में ले रखी थीं। कई विपक्षी नेताओं ने कहा कि वे छात्रों की आवाज को सदन में उठाते रहेंगे और सरकार को जवाब देने पर मजबूर करेंगे। दूसरी ओर सरकार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस्तीफे की मांग को सिरे से खारिज किया जा चुका है। सत्ता पक्ष का मानना है कि विपक्ष तथ्यों के बजाय माहौल बनाने की राजनीति कर रहा है। सरकार की दलील है कि मामले की जांच जारी है और जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं है। विपक्ष की रणनीति क्या है विपक्षी दल इस मुद्दे को केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी के तौर पर नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़े बड़े सवाल के रूप में पेश कर रहे हैं। संसद के भीतर स्थगन प्रस्ताव, वॉकआउट और संयुक्त बयान जैसी संसदीय रणनीतियों के साथ-साथ संसद के बाहर छात्रों के आंदोलन से तालमेल इस रणनीति का हिस्सा दिख रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर समन्वय के लिए बैठकें भी हो रही हैं, ताकि सभी दल एक सुर में सरकार को घेर सकें। राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस और सरकार के सामने रखी गई तीन मांगों ने विपक्षी हमले को एक स्पष्ट दिशा दे दी है। विपक्ष चाहता है कि यह मुद्दा सिर्फ संसद के रिकॉर्ड में दर्ज होकर न रह जाए, बल्कि सड़क से सदन तक सरकार पर लगातार दबाव बना रहे। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विपक्ष के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह सीधे-सीधे करोड़ों परिवारों की भावनाओं से जुड़ा है। परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के घरों तक यह बहस पहुंच चुकी है और विपक्ष इसे युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रहा है। सरकार का पक्ष और बचाव की रणनीति सरकार की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि वह छात्रों के हितों को लेकर संवेदनशील है। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि गड़बड़ी के आरोपों की जांच पूरी गंभीरता से हो रही है और जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। सरकार का यह भी दावा है कि परीक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार की रणनीति यह है कि वह इस मुद्दे पर रक्षात्मक दिखने के बजाय जांच और सुधार के कदमों को आगे रखकर जवाब दे। संसदीय कार्य से जुड़े मंत्रियों ने विपक्ष से अपील की है कि वह हंगामे के बजाय नियमों के तहत चर्चा में हिस्सा ले, जहां सरकार हर सवाल का जवाब देने को तैयार है। हालांकि सरकार के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे संसद में विपक्ष के हमलों का जवाब देना है, तो दूसरी तरफ सड़क पर उतरे छात्रों के भरोसे को भी बहाल करना है। जानकारों का मानना है कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से यह भरोसा नहीं लौटेगा, इसके लिए ठोस और दिखने वाले कदम जरूरी होंगे। जेपी नड्डा का बयान, सरकार की पहली बड़ी प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का बयान सरकार की ओर से पहली बड़ी प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नड्डा ने विपक्ष पर छात्रों के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं होने देगी। उन्होंने संसद में व्यवस्थित चर्चा की वकालत की और विपक्ष से सदन की गरिमा बनाए रखने की अपील की। नड्डा के बयान को सियासी गलियारों में इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि सरकार इस मुद्दे पर चुप्पी की रणनीति छोड़कर अब आक्रामक जवाब देने के मूड में है। पार्टी स्तर पर भी प्रवक्ताओं को इस मुद्दे पर तथ्यों के साथ पक्ष रखने के निर्देश दिए जाने की बात सूत्रों के हवाले से कही जा रही है। विपक्ष ने नड्डा के बयान को नाकाफी बताया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सवाल भाषणों का नहीं, जवाबदेही का है। उनकी दलील है कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती और छात्रों को न्याय का भरोसा नहीं मिलता, तब तक कोई भी बयान महज औपचारिकता है। संसदीय गतिरोध का आगे का गणित संसद में संख्या बल के लिहाज से सरकार भले ही मजबूत स्थिति में हो, लेकिन इस तरह के भावनात्मक मुद्दों पर संख्या से ज्यादा धारणा की लड़ाई अहम होती है। विपक्ष के पास संसद की कार्यवाही को प्रभावित करने की क्षमता है और वह इसका पूरा इस्तेमाल कर रहा है। वहीं सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह कामकाज भी चलाए और इस मुद्दे पर घिरती हुई भी न दिखे। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच बातचीत की कोशिशें हो सकती हैं, ताकि सदन चलाने का कोई बीच का रास्ता निकले। संसदीय परंपरा में ऐसे मौकों पर कार्य मंत्रणा समिति की बैठकों और अनौपचारिक संवाद से रास्ता निकाला जाता रहा है। लेकिन फिलहाल दोनों पक्षों के तेवर देखकर नहीं लगता कि कोई भी झुकने को तैयार है। इस गतिरोध का एक पहलू यह भी है कि लंबा टकराव खुद विपक्ष के लिए भी जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि जनता संसद से हंगामा नहीं, समाधान चाहती है। ऐसे में दोनों पक्षों को यह संतुलन साधना होगा कि दबाव भी बना रहे और संसद की गरिमा भी। छात्रों की निगाहें संसद पर टिकीं संसद के भीतर चल रही इस लड़ाई को देश भर के छात्र बेहद उम्मीद और बेचैनी के साथ देख रहे हैं। परीक्षा की तैयारी करने वाले लाखों छात्रों के लिए यह बहस उनके भविष्य से सीधे जुड़ी है। छात्र संगठनों का कहना है कि उन्हें राजनीति से मतलब नहीं, उन्हें तो बस यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत सुरक्षित हाथों में है। अभिभावकों की चिंता भी कम नहीं है। वर्षों की तैयारी, कोचिंग का खर्च और बच्चों की मानसिक स्थिति, इन सब पर इस अनिश्चितता का सीधा असर पड़ता है। कई अभिभावक संगठनों ने सांसदों से अपील की है कि वे इस मुद्दे को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखें। शिक्षाविदों का मानना है कि संसद इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा कर एक मिसाल कायम कर सकती है। अगर दोनों पक्ष हंगामे के बजाय ठोस बहस करें, तो परीक्षा सुधारों की दिशा में बड़े कदमों का रास्ता खुल सकता है। आगे क्या होगा आने वाले दिनों में संसद का यह गतिरोध किस करवट बैठेगा, यह काफी हद तक सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा। अगर सरकार चर्चा का कोई स्वीकार्य प्रारूप पेश करती है, तो सदन के सामान्य ढंग से चलने की उम्मीद बन सकती है। वहीं विपक्ष अगर इस्तीफे की मांग पर ही अड़ा रहा, तो हंगामे का यह सिलसिला सत्र के अंत तक खिंच सकता है। इस बीच सड़क पर चल रहा छात्र आंदोलन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे निर्णायक कारक बना रहेगा। आंदोलन जितना व्यापक होगा, संसद में सरकार पर दबाव उतना ही बढ़ेगा। सियासी जानकारों की मानें तो NEET पेपर लीक का यह मुद्दा आने वाले समय की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। द इनसाइड जर्नल संसद की कार्यवाही और इस मुद्दे से जुड़े हर बड़े घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है।









