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23 जुलाई 2026 · नई दिल्लीई-पेपरलॉगिन
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शिक्षा

DU में एक साल की PG डिग्री शुरू: NEP 2020 के तहत बदल रहा दाख़िले का पूरा ढाँचा

दिल्ली विश्वविद्यालय में वन-ईयर पीजी, JNU का CUET पर पूरा शिफ़्ट — छात्रों के लिए पूरी गाइड

DU में एक साल की PG डिग्री शुरू: NEP 2020 के तहत बदल रहा दाख़िले का पूरा ढाँचा

देश की उच्च शिक्षा में इस समय सबसे बड़ा बदलाव पोस्ट-ग्रेजुएशन के ढाँचे में हो रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत एक-वर्षीय स्नातकोत्तर यानी वन-ईयर पीजी कार्यक्रमों की शुरुआत कर दी है। विश्वविद्यालय ने मानविकी, वाणिज्य और विज्ञान के विभिन्न विषयों में ऐसे दर्जनों कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनसे हज़ारों अतिरिक्त सीटें जुड़ी हैं। इन सभी में दाख़िला CUET (PG) के स्कोर के आधार पर होगा। दूसरी ओर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) ने अपने स्नातक दाख़िले पूरी तरह CUET (UG) पर स्थानांतरित कर दिए हैं, जिसमें दस विदेशी भाषाओं के बीए कार्यक्रम और बीएससी आयुर्वेद बायोलॉजी जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं। इन दोनों बदलावों को मिलाकर देखा जाए तो साफ़ है कि भारत की उच्च शिक्षा अब एक साझा प्रवेश परीक्षा और लचीले पाठ्यक्रम-ढाँचे की ओर तेज़ी से बढ़ रही है। छात्रों और अभिभावकों के मन में इस समय सबसे बड़े सवाल यही हैं — एक साल की पीजी डिग्री की मान्यता क्या होगी, कौन इसके लिए पात्र है, दो-वर्षीय पीजी का क्या होगा, और CUET की तैयारी कैसे की जाए। इस रिपोर्ट में इन सभी सवालों को सिलसिलेवार समझते हैं। ## वन-ईयर पीजी आख़िर है क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने स्नातक स्तर पर चार-वर्षीय अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP) की व्यवस्था दी है, जिसमें चौथा वर्ष शोध या विशेषज्ञता पर केंद्रित होता है। इसी ढाँचे के साथ यह तर्क जुड़ा कि जिस छात्र ने चार साल की स्नातक डिग्री शोध के साथ पूरी कर ली है, उसे स्नातकोत्तर के लिए दो साल और लगाने की ज़रूरत नहीं — एक साल पर्याप्त है। इसलिए अब दो रास्ते बनते हैं: - **चार-वर्षीय स्नातक (ऑनर्स विद रिसर्च) के बाद** — एक वर्षीय पीजी। - **तीन-वर्षीय स्नातक के बाद** — पारंपरिक दो-वर्षीय पीजी। यानी दो-वर्षीय पीजी ख़त्म नहीं हो रहा। दोनों विकल्प साथ-साथ चलेंगे, और छात्र अपनी स्नातक डिग्री की अवधि के हिसाब से रास्ता चुनेगा। यह बात इसलिए दोहराना ज़रूरी है क्योंकि सोशल मीडिया पर यह भ्रम काफ़ी फैला है कि दो-वर्षीय पीजी बंद हो रहा है। ## किन विषयों में शुरू हुए हैं ये कार्यक्रम दिल्ली विश्वविद्यालय ने जिन क्षेत्रों में एक-वर्षीय पीजी कार्यक्रम शुरू किए हैं, उनमें वाणिज्य (एमकॉम), विज्ञान के कई विषय जैसे बायोकेमिस्ट्री, और भाषाओं के कई मास्टर कार्यक्रम शामिल हैं। मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषयों को भी इसमें जोड़ा गया है। इन कार्यक्रमों के जुड़ने से विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर स्तर की सीटों की कुल संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो हर साल दाख़िले की मारामारी झेलने वाले छात्रों के लिए राहत की ख़बर है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी कार्यक्रमों में प्रवेश CUET (PG) के अंकों से तय होगा। यानी विश्वविद्यालय की अपनी अलग प्रवेश परीक्षा का दौर लगभग समाप्त हो चुका है। ## CUET क्यों बना केंद्र-बिंदु CUET यानी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट का मूल विचार यही था कि देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाख़िले के लिए एक साझा परीक्षा हो, ताकि: **पहला —** अलग-अलग बोर्ड की अंक-पद्धति से पैदा होने वाली असमानता कम हो। किसी बोर्ड में 95 प्रतिशत आना आसान है, किसी में बहुत कठिन। साझा परीक्षा इस अंतर को बराबर करती है। **दूसरा —** छात्रों को दर्जनों विश्वविद्यालयों के अलग-अलग फ़ॉर्म भरने, अलग-अलग शहरों में परीक्षा देने और अलग-अलग फ़ीस चुकाने से मुक्ति मिले। **तीसरा —** छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को बड़े विश्वविद्यालयों तक पहुँचने का समान अवसर मिले। इन उद्देश्यों में CUET को आंशिक सफलता मिली है। दाख़िले की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और केंद्रीकृत ज़रूर हुई है। लेकिन इसके साथ कुछ नई चुनौतियाँ भी खड़ी हुई हैं, जिन पर शिक्षाविद लगातार सवाल उठा रहे हैं। ## बदलाव के साथ आईं चुनौतियाँ **कोचिंग पर निर्भरता:** जैसे ही दाख़िला एक प्रतियोगी परीक्षा से जुड़ा, उसके इर्द-गिर्द कोचिंग का बाज़ार खड़ा हो गया। जो व्यवस्था बोर्ड-अंकों के दबाव को घटाने के लिए बनी थी, वह अब एक और परीक्षा का दबाव जोड़ती दिख रही है। **शैक्षणिक कैलेंडर:** परीक्षा, परिणाम और काउंसलिंग की लंबी प्रक्रिया के कारण कई बार सत्र देर से शुरू होते हैं, जिससे पढ़ाई के दिन कम हो जाते हैं। **तकनीकी अड़चनें:** बड़े पैमाने पर ऑनलाइन परीक्षा में सर्वर, स्लॉट और केंद्र आवंटन से जुड़ी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। **पाठ्यक्रम और शिक्षण में बदलाव:** विश्वविद्यालयों को अपने पढ़ाने के तरीक़े और सेमेस्टर-संरचना में भी बदलाव करने पड़े हैं, जिसके लिए शिक्षकों की अतिरिक्त संख्या और प्रशिक्षण की ज़रूरत महसूस की जा रही है। ## छात्रों के लिए इसका व्यावहारिक मतलब **अगर आप चार-वर्षीय स्नातक कर रहे हैं:** आपके पास चौथे वर्ष में शोध चुनने और फिर एक वर्ष में पीजी पूरा करने का विकल्प है। इसका सीधा फ़ायदा यह है कि पाँच साल में स्नातक और स्नातकोत्तर — दोनों पूरे हो जाते हैं, जो पहले छह साल लेते थे। पीएचडी की ओर बढ़ने वालों के लिए यह रास्ता तेज़ है, क्योंकि शोध का अनुभव पहले ही मिल चुका होता है। **अगर आप तीन-वर्षीय स्नातक कर रहे हैं:** आपके लिए दो-वर्षीय पीजी का रास्ता खुला है और उसकी मान्यता पर कोई असर नहीं पड़ा है। नौकरी और आगे की पढ़ाई — दोनों में यह डिग्री पहले की तरह मान्य है। **अगर आप कामकाजी हैं और पीजी करना चाहते हैं:** एक वर्षीय कार्यक्रम समय और लागत — दोनों बचाता है, बशर्ते आप पात्रता शर्तें पूरी करते हों। ## CUET की तैयारी कैसे करें: व्यावहारिक रणनीति **पहला क़दम — आधिकारिक सूचना ही पढ़ें।** पाठ्यक्रम, विषय-कोड, परीक्षा पैटर्न और तारीख़ों के लिए केवल राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और संबंधित विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भरोसा करें। सोशल मीडिया पर घूमते स्क्रीनशॉट अक्सर पुराने या ग़लत होते हैं। **दूसरा — विषय का चुनाव सोच-समझकर करें।** CUET में विषयों का संयोजन आगे मिलने वाले कोर्स तय करता है। जिस पाठ्यक्रम में जाना है, पहले उसकी पात्रता शर्तें पढ़ें, फिर उसी हिसाब से विषय चुनें। **तीसरा — NCERT की किताबें आधार बनाएँ।** ज़्यादातर विषयों का पाठ्यक्रम बारहवीं कक्षा के स्तर पर आधारित रहता है। मोटी गाइड-बुक्स से पहले मूल पाठ्यपुस्तक पर पकड़ बनाएँ। **चौथा — मॉक टेस्ट और समय-प्रबंधन।** परीक्षा में प्रश्नों की संख्या और समय का अनुपात कठिन होता है। सप्ताह में कम से कम दो पूर्ण मॉक टेस्ट देकर गति बढ़ाएँ और ग़लतियों का विश्लेषण करें। **पाँचवाँ — जनरल टेस्ट और भाषा अनुभाग को हल्के में न लें।** कई छात्र सिर्फ़ डोमेन विषयों पर ध्यान देते हैं और भाषा या सामान्य ज्ञान वाले हिस्से में अंक गँवा बैठते हैं, जबकि यही हिस्सा कट-ऑफ़ के अंतर को तय करता है। **छठा — मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान।** लगातार प्रतियोगी माहौल में तनाव स्वाभाविक है। नियमित नींद, थोड़ी शारीरिक गतिविधि और परिवार से खुली बातचीत तैयारी का उतना ही ज़रूरी हिस्सा है जितना पढ़ाई। ## अभिभावकों के लिए सुझाव अभिभावकों की भूमिका इस बदलाव में बहुत अहम है। कुछ बातें ध्यान रखने योग्य हैं: - बच्चे की तुलना दूसरों से करने के बजाय उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुनने में मदद करें। - एक परीक्षा को जीवन का अंतिम निर्णय न बनाएँ। CUET के अलावा राज्य विश्वविद्यालयों, निजी संस्थानों और कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों के अनेक रास्ते खुले हैं। - फ़ीस, छात्रवृत्ति और दस्तावेज़ों की तैयारी पहले से कर लें, ताकि काउंसलिंग के समय भागदौड़ न हो। - किसी भी "गारंटीड सीट" या "मैनेजमेंट कोटा" के दावे से सावधान रहें। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाख़िला केवल घोषित मेरिट प्रक्रिया से होता है। ## आगे क्या शिक्षाविदों का मानना है कि अगले कुछ वर्षों में और विश्वविद्यालय इस ढाँचे को अपनाएँगे, और एक-वर्षीय पीजी धीरे-धीरे सामान्य विकल्प बन जाएगा। साथ ही यह भी ज़रूरी होगा कि इन कार्यक्रमों की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और शोध के अवसर उसी अनुपात में बढ़ें — वरना डिग्री की अवधि तो घट जाएगी, पर उसकी गहराई पर सवाल उठने लगेंगे। छात्रों के लिए फ़िलहाल सबसे व्यावहारिक सलाह यही है कि आधिकारिक सूचनाओं पर नज़र रखें, समय-सीमा से पहले आवेदन करें, और अपनी स्नातक डिग्री की अवधि के अनुसार सही पीजी विकल्प चुनें। सही जानकारी और समय पर लिया गया निर्णय — यही इस बदलते दौर में सबसे बड़ी बढ़त है। ## अक्सर पूछे जाने वाले सवाल **क्या एक-वर्षीय पीजी की मान्यता दो-वर्षीय जितनी ही है?** हाँ। यह डिग्री राष्ट्रीय शिक्षा नीति के ढाँचे के तहत विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की जाती है और इसकी अकादमिक मान्यता दो-वर्षीय पीजी के समान है। अंतर केवल पात्रता का है — एक वर्षीय कार्यक्रम उन्हीं के लिए है जिन्होंने चार-वर्षीय स्नातक शोध के साथ पूरा किया हो। **क्या तीन-वर्षीय स्नातक करने वाला छात्र एक-वर्षीय पीजी में दाख़िला ले सकता है?** सामान्य नियम के अनुसार नहीं। तीन-वर्षीय स्नातक के बाद दो-वर्षीय पीजी का रास्ता है। हालाँकि हर विश्वविद्यालय अपनी विस्तृत पात्रता शर्तें अलग से जारी करता है, इसलिए आवेदन से पहले संबंधित संस्थान की आधिकारिक अधिसूचना पढ़ना ज़रूरी है। **क्या इससे पीएचडी में प्रवेश प्रभावित होगा?** नहीं। दोनों तरह की पीजी डिग्री के बाद पीएचडी का रास्ता खुला रहता है। चार-वर्षीय स्नातक और एक-वर्षीय पीजी करने वाले छात्रों को शोध का पूर्व अनुभव होने के कारण कुछ मामलों में लाभ मिल सकता है। **CUET में कितने विषय चुनने चाहिए?** केवल उतने ही, जितने आपके लक्षित पाठ्यक्रमों के लिए आवश्यक हैं। ज़्यादा विषय चुनने से तैयारी बँट जाती है और परीक्षा के दिन थकान बढ़ती है। पहले तीन-चार लक्षित विश्वविद्यालय और कोर्स तय करें, फिर उनकी साझा आवश्यकता के अनुसार विषय चुनें। **अगर CUET में अपेक्षित अंक न आएँ तो?** विकल्प समाप्त नहीं होते। राज्य विश्वविद्यालय, ओपन यूनिवर्सिटी, निजी संस्थान और कौशल-आधारित डिप्लोमा — कई रास्ते खुले रहते हैं। कई छात्र एक वर्ष बाद बेहतर तैयारी के साथ दोबारा प्रयास भी करते हैं, जो पूरी तरह सामान्य है। **दस्तावेज़ों में क्या-क्या तैयार रखना चाहिए?** दसवीं और बारहवीं की अंकतालिका, स्नातक की अंकतालिका व डिग्री, श्रेणी प्रमाण-पत्र (यदि लागू हो), निवास प्रमाण, पहचान-पत्र और हाल की तस्वीर — इन्हें स्कैन करके पहले से एक फ़ोल्डर में रखें। काउंसलिंग के समय की भागदौड़ इससे काफ़ी घट जाती है।

Ravi Tunna
Ravi Tunna
वरिष्ठ संपादक · The Inside Journal
रवि टुन्ना एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो देश-दुनिया, कारोबार, राजनीति और खेल की गहराई से रिपोर्टिंग करते हैं। नज़र हर ख़बर पर।
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