मीराबाई चानू की नज़र इतिहास पर: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लगातार तीसरे स्वर्ण के लिए उतरीं भारत की 'आयरन लेडी'
गोल्ड कोस्ट 2018 और बर्मिंघम 2022 के बाद अब ग्लासगो में महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में मीराबाई चानू के पास लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ स्वर्ण जीतकर इतिहास रचने का सुनहरा मौका है।

ग्लासगो: भारतीय खेलों की सबसे चमकदार सितारों में से एक, भारोत्तोलक मीराबाई चानू एक बार फिर देश को गौरव के शिखर पर पहुंचाने के लिए तैयार हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के चौथे दिन मीराबाई महिलाओं के 48 किलोग्राम भार वर्ग में मैदान में उतरीं, और इस बार दांव पर सिर्फ एक और पदक नहीं, बल्कि इतिहास लगा हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 31 वर्षीय मीराबाई इन खेलों में स्वर्ण की प्रबल दावेदार मानी जा रही थीं और अगर वह जीत दर्ज करती हैं तो लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ स्वर्ण जीतने वाली भारतीय भारोत्तोलक बन जाएंगी।
दो स्वर्ण, एक सपना मणिपुर की इस बेटी ने गोल्ड कोस्ट 2018 और बर्मिंघम 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर पहले ही अपनी महानता साबित कर दी है। अब ग्लासगो में तीसरे स्वर्ण के साथ वह उन चुनिंदा खिलाड़ियों की सूची में शामिल होना चाहती हैं जिन्होंने इस बहु-खेल आयोजन में लगातार दबदबा बनाए रखा। भारोत्तोलन जैसे खेल में, जहां चोटों का खतरा हमेशा बना रहता है और शरीर पर भारी दबाव पड़ता है, लगातार तीन संस्करणों में शीर्ष पर बने रहना असाधारण उपलब्धि मानी जाती है।
संघर्ष से शिखर तक मीराबाई चानू की कहानी सिर्फ पदकों की नहीं, बल्कि जुझारूपन और अटूट इच्छाशक्ति की है। एक साधारण परिवार से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने का उनका सफर करोड़ों भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा है। टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक जीतकर उन्होंने देश का सिर गर्व से ऊंचा किया था, और तब से वह भारतीय भारोत्तोलन का चेहरा बनी हुई हैं। चोटों और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद बार-बार वापसी करना और बड़े मंच पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देना उनकी सबसे बड़ी खूबी है।
चौथे दिन भारत की पदक चुनौती जिस दिन मीराबाई मैदान में उतरीं, वह भारत के लिहाज से बेहद अहम रहा। रिपोर्ट्स के अनुसार चौथे दिन भारोत्तोलन के साथ-साथ जिम्नास्टिक्स और मुक्केबाजी के मुकाबले भी केंद्र में रहे, जिनमें भारतीय दल से कई पदकों की उम्मीद थी। मीराबाई ने इससे पहले भारतीय भारोत्तोलन टुकड़ी से संयम बनाए रखने और दबाव में शांत रहकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने की अपील की थी। एक अनुभवी खिलाड़ी के तौर पर वह युवा साथियों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका भी निभा रही हैं।
तकनीक और मानसिक मजबूती 48 किग्रा वर्ग सबसे हल्का भार वर्ग है, लेकिन यहां प्रतिस्पर्धा किसी भी अन्य वर्ग से कम नहीं। इसमें छोटी-छोटी गलतियां भी पदक का रंग बदल सकती हैं। मीराबाई की सफलता का राज़ उनकी बेहतरीन स्नैच तकनीक और क्लीन एंड जर्क में स्थिरता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उनका आत्मविश्वास और बड़े मुकाबलों का अनुभव उन्हें बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे रखता है।
पूरे देश की दुआएं मीराबाई के मुकाबले को लेकर सोशल मीडिया पर देशभर से शुभकामनाओं का तांता लग गया। खेल प्रेमियों से लेकर आम नागरिकों तक, हर कोई चाहता है कि भारत की यह 'आयरन लेडी' एक बार फिर तिरंगे को सबसे ऊंचा लहराए। भारोत्तोलन भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स में हमेशा से पदकों का भरोसेमंद ज़रिया रहा है, और मीराबाई उस विरासत की सबसे बड़ी ध्वजवाहक हैं।
आगे की राह चाहे परिणाम जो भी हो, मीराबाई चानू पहले ही भारतीय खेल इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा चुकी हैं। ग्लासगो का यह मुकाबला उनके शानदार करियर का एक और अध्याय है। द इनसाइड जर्नल की टीम इस ऐतिहासिक प्रयास पर पल-पल की नज़र बनाए हुए है और आपको हर अपडेट सबसे पहले पहुंचाती रहेगी। भारतीय खेल जगत के लिए यह गर्व का क्षण है, और मीराबाई जैसी खिलाड़ी ही देश की नई पीढ़ी को यह सिखाती हैं कि सपने कितने भी बड़े हों, मेहनत और लगन से उन्हें हकीकत में बदला जा सकता है।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: बॉक्सिंग रिंग में फिर भारत-पाकिस्तान की टक्कर, जादूमणि सिंह और सुमामा रहमान आमने-सामने
Ravi Tunna
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: रिशिकांत सिंह ने भारोत्तोलन में दिलाया भारत को पहला सिल्वर, स्नैच में बनाया नया गेम्स रिकॉर्ड
Ravi Tunna
टी20 वर्ल्ड कप से सबसे लंबी हार तक: आखिर कहाँ चूक रही टीम इंडिया?
Ravi Tunna







